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क्या सुहाना मौसम था| ना ऐसी भीषण गर्मी की मच्छरों और मखियों की भीनभीनाहट सुनाई पड़ती और ना ही ऐसी सर्दी की बंदा बिस्तर से उठने को ऐसे जिझके मानो कह रहा हो मैं पैदा ही क्यों हुआ अगर इतनी गर्माहट से बाहर निकल ठिठुरना ही रह गया था तो|
क्या सुबह थी और मुझे ऐसे सुबह का लुत्फ़ उठाने का सुअवसर प्राप्त हुआ क्योंकि मैं अपने निर्धारित समय से एक घंटा पहले ही उठ गया था|
पंछी चहचाहा रहे थे, ठंडी ठंडी हवा चल रही थी और फिर ऐसा कुछ हो गया| एक क्षण के लिए मैं यदि आपसे कहूँ, एक ऐसे समय की कल्पना कीजिए जब आप अपनी गाड़ी में बैठे हैं और आपका सबसे फॅवुरेट गाना बजने लगता है और जैसे ही आप उसका मज़ा लूटने को होते हैं, कोई दूसरा सहयात्री उस गाने को बोल ऐसे चिल्लाने लगे जैसे पुराने ऑटो का भोपु बज पड़ा हो|
या कल्पना कीजिए ऐसा सीन की आप अपनी गाड़ी में बैठने लगे हों कि आपका ड्राइवर बेसुरी धुन में शुरू हो जाए – जस्ट चिल चिल जस्ट चिल………………मानो जैसे उसे साक्षात कटरीना ने दर्शन दे दिए हों और उसकी आत्मा में ऐसे प्रवेश करी की सारा दिन इसी कर्कश धुन में उसको मंत्र की तरह जप्ता रहा, कानों के कीड़े की तरह मानो रेंगी ही जा रहा हो| सब शांति भंग| जहाँ सकाम कर्म की पूर्ति करने की रेखायें मंडरानी चाहिए थी वहाँ बज रहा था जस्ट चिल चिल जस्ट चिल|
कोई संशय रह गया हो तो ऐसा सोचिए की आपको आपके मूलाधार में खुजली करनी हो और आप बहुत प्रतिष्ठित लोगों के बीच बैठे हैं और कर नहीं सकते| अब आपको जो भी महसूस हो रहा है, उसका हज़ार गुना मुझे अनुभव हुआ उस सुबह|
जानकार आश्चर्यचकित होंगे की भावनाओं के ज्वालामुखी के फटने के पीछे कारण एक साधारण सा गढ़ा था| एक गधा मेरे समीप आकर ढेँचू ढेँचू करने लगा|
मानो मेरा सुनेहरा सवेरा काली रात में बुरे सपने में बदल गया| जो भी था, गधा अभी तक चुप ना हुआ, लगा रहा| मन तो किया लाठी लेके उसे दूर दौड़ा के आऊँ किंतु क्या करूँ, आचार्य होने के नाते निःस्वार्थ प्रेम का पालन करता हूँ|
और सुनिए, जब मैं नाश्ता करने गया, मैं क्या देखता हूँ वा अनादि गधा तो मेरे कुटुंभ में बँटवारा करवा चुका था| कइयों को तो कोई फ़र्क ही नही पड़ा था, वे कुछ उच्च पद को प्राप्त होते प्रतीत होते थे|
मैने अंदाज़ा लगाया कि शायद उमर ने उन्हें सम्यक रास्ते पर जीना सीखा दिया है या यूँ कहें वह इन सब चीज़ों के प्रति सुन्न हो चुके थे|
कारण कुछ भी हो, मेरे विचार उनके विचार से मेल नही खाते थे| फिर कुछ कलाकार सदस्य जिनकी चेतना में चक्र, धूप डीप की सुगंध, ग्यान की भरमार, लहसुन की अनुपस्थिति थी, मेरे परिवार के हिप्पी लोग|
उन्हें तो गधे के प्रति प्रेम उमड़ रहा था, स्वयं भगवान शिव की वाणी सुनाई पद रही थी| मैं तो भगवान शिव के वचन|
अपने आस पास खिसकी दुनिया को देख मैं भी चकराने लगा, उनके तात्या से मैं अंजान था – ऐसा अजीब सा प्राणी भगवान का भेजा कैसे हो सकता है| विवाद करने की इक्चा हुई किंतु हर बार मेरा तर्क काट दिया गया, गढ़ा चीखता रहा और मेरी मान की शांति भंग होती गई|
शूकर उस उपर वाले का जो की कुछ ऐसे सदस्य मिले जिनको मेरी तरह उस गढ़े से खीज हो रही थी| ये तो मेरे अपने लोग थे, मेधावी| हम अक्सर साथ बैठकर विचार विमर्श किया करते कि ऐसे गधों से संसार को कैसे छुटकारा दिलवाया जाए|
हम हर रोज़ाना वाद विवाद किया करते किस मानसिकता के कारण गधे ढेँचू ढेँचू करते हैं और हर संवाद में हम भेड़ियों की तरह चीखते रह जाते, अपने पागलपन में मशगूल, ठहाके लगाते हुए उन बातों को सोचकर की कभी हुमारे हवाले ऐसे गधों को छोड़ दिया जाए तो हम उनकी कैसे नवाज़ी करेंगे| इस समय तक उस गधे ने अपना मित्रगण बड़ा कर लिया था|
शोर की तीव्रता और भी बढ गयी थी|
कभी कभी रात में मैं दबे पंजों पर, बिल्ली की भाँति चुपके से बाहर निकलता, ऐसे गधों को डंडे से भगाने के लिए| फिर भी हर सवेरे वे गधे एक झुंड में इकट्ठे हो जाते, मेरी तरफ तिरछी नज़रें गड़ाए हुए| उनके उपर वाद विवाद चलते रहे, ढेँचू ढेँचू चलती रही, यह सब तक चलता रहा जब तक एक दिन मेरे पिता बीच में आए और उन्होने साधना करने की सलाह दी|
मैने उनको ओर देखा, उतनी ही झुंझलाहट से, ख़तरे की घंटी वैसे बजती हुई मेरे भीतर जैसे कोई ट्रॅफिक पोलीस ने गाड़ी तेज़ चलाने के कारण चलान काटने के लिए रोक लिया हो|
मेरे पिता ने गधे की ओर इशारा काइया. उस गधे के चारों ओर हज़ारों मक्खियाँ भीनभीना रही थी जिनकी आवाज़ से कान फट जाएं मानो जैसे छोटे बच्चे स्कूल असेंब्ली में उपर नीचे गाने की बहाने शोर मचा रहे हों| ऐसे विषम परिस्थति के बावजूद, गधा, इन सब से अन्भिग्य वहीं खड़ा था जैसे समाधीष्ट हो, आँखें आधी बाँध|
मेरे पिता ने गधे से कुछ सीखने को कहा| उन्होने दर्शाया कैसे मेरी दुतकार के बावजूद, हज़ार मखियों के भीनभीनाहट के बावजूद वह शांत था, मानो ध्यानस्त हो| उन्होने मुझसे कहा की जब एक गधा साधना रत हो सकता है, तो मैं क्यूँ नही? मुझे बात में दम लगा|
तो उस रात मैं भी शून्यता में बैठ कर मनन करने लगे| अपनी श्वास को शांत काइया, शरीर को आराम दिया और क्या देखता हूँ कि अगली सुबह दोबारा से खुश और ताज़ा|
 मुझे ऐसा लगा की अभी तक तो मैं गधे की भाँति जीवन जी रहा था| मुझे कुछ दिन लगे यह सब शांत होने की प्रक्रियाओं को सीखने के लिए, इसमें उतना माहिर होने के लिए जितना माहिर वा गधा था|
उसकी बात परिवार में छिढ़ती किंतु तथ्य तो तथ्य ही रहने थे| गधे के चारों ओर अभी भी मक्खियाँ थी, मेरे चारों ओर कुछ अभी भी वह गधा था किंतु हँसने की बात यह है की हम दोनों ही अब शांत थे|
हैरानी की बात यह लगी साधना ने मुझे हर परिस्थिति में शांत होना सीखा दिया था| चाहे वो सुआर आवाज़ें निकालें, बैल लड़ें, कौआ कौउ कौउ करें| मानो जैसे यह सब ध्वनियाँ मेरे लिए बंद हो गई हों|
अगली सुबह जब मैने उठकर ग्रीन टी की चुस्की ली, मैने नीचे देखा और गधे ने उपर दृष्टि करी| उस गधे ने मुझे कूम गधा बना दिया था| उसने मुझे और ताकतवर और प्रतिरक्षित बना दिया था हर उस चीज़ से जो मेरे लिए ठीक नही थी| मैं नीचे गया और उस गधे को गले लगा लिया क्यूंकी मैने अपनी सीख ले ली थी| यह गधा मेरी उन्नति के लिए अत्यावश्यक था और उसी ने मेरे लिए साधना के रास्ते प्रशस्त किए थे|
जो भी इस लेख को पढ़ रहे हैं, मैं एक सुझाव दूँगा की अपने जीवन में “गधों” का आभार व्यक्त करें| उन तेज़ तरार अकल मंदों को धन्यवाद दें जिन्होने आपके इर्द गिर्द ढेँचू ढेंचू करने को अपनी नैतिक ज़िम्मेदारी मान लिया है|
हर दिन वे आपको एक बेहतर इंसान बनाने में कारगर साबित होते हैं|
मेरा धन्यवाद उन सभी गधों को जिन्होने मुझे धैर्य और स्वीकृियत सिखाई और सबसे ज़रूरी – क्षमा करना सिखाया|
हो सके तो आज जाकर एक गधे को गले लगा लेना|
मेरा प्रेम और आशीर्वाद
लव यू
ब्लेस यू
😏😏😏😉😉😜