IMG-20160929-WA0020

सभी महान सभ्यताएँ, सभी महान महाराज, सभी महान साम्राज्य, सभी महान पुरुष एक समानता रखते थी – इन सभी के पास संत रुपी मार्गदर्शक थे| इन सभी के लिए संतों का महत्व था एक आध्यात्मिक सलहाकार के तौर पर, जो की इन सभी को नैतिक मूल्यों में बांधे रखने का कार्य करते थे| यह सभी को मालूम था की सिखाया वही जा सकता है जो सत्य है इसीलिए ज्ञान के प्रदान के पश्चात साधना करवाई जाती थी और माना जाता था की इसी में सर्व हित है| अध्यात्म के बिना मनुष्य अपना अस्तित्व भूल जाता है और साथ ही समाज के प्रति उसका धर्म भी, यह भी एक समकालीन मान्यता थी|

इसी सन्दर्भ में संतो को पूजा जाता था और फैसलाकर्मियों के समीप रखा जाता था जिससे के समाज का और समाज में रहने वाली अवाम का चहोमुखी विकास हो सके|

किन्तु इतिहास के किसी पृष्ठ में यह साधारण बदल गया| संत और समाज भिन्न वर्ग हो गए| ऐसा प्रचलन हो गया की संतों को शहर छोड़ जंगलों में रहने के उम्मीद की गई| शैतान उन्हें वनों में छोड़ आये या वे स्वयं चले गए, यह तो आपके शोध पर छोड़ता हूँ|

यह बात कुछ समझ नहीं आयी की गहरे जंगलों में संतों को भेजने का औचित्य क्या रहा होगा? वन में बैठ कर किसे शान्ति नहीं मिलेगी? क्या यह ऐसा नहीं है की भारी वर्षा में खड़े होकर अपने ऊपर पानी की बाल्टियाँ डालना| और जो सबसे बहुमूल्य है, जो सबसे कीमती है और जो आज की युवा पीड़ी को मार्ग दिखाने की क्षमता रखता है, ऐसी शक्ति को जंगल में रखने का क्या अभिप्राय है? मेरे अनुसार तो ऐसी शक्ति को हमारे जीवन में साथ ही रहना चाहिए|

शिवयोग एक औजार है उस मनुष्य के लिए जो अपने जीवन को एक सुन्दर रूप देना चाहता है| मैं सोचता था की भगवान् और गुरु तो अनपढ़ों का खेल है| पर मैं इससे गलत न् हो सकता था| मैंने देखा की कैसे समाज का सबसे पढ़ा लिखा वर्ग – डॉक्टर और इंजीनियर तो बाबाजी को सबसे ज़्यादा मानते हैं, उनके ज्ञान की महत्ता समझते हैं| और उसके बाद से मैं समझ गया था की शिवयोग मन को चुस्त बनाता है, संज्ञानात्मक विशेषताओं को तीव्र करता है और उत्पादकता को बड़ाता है| शिवयोग एक व्यक्ति को दिन के कठिन परिश्रम के बाद आनंद में डुबकी लगाने का अवसर देता है| सारी विशेषताएँ जो की जंगल में नहीं शहर में उपयोगी हैं|

शिवयोग के माध्यम से मैं अध्यात्म को जन मानस के बीच से दोबारा उदय होते देखता हूँ ठीक वैसे ही जैसे बसंत ऋतू में बीज अंकुरित हो उठते हैं| मैं संतों को सभी मनुष्यों में ऐसे घुलते मिलते देखता हूँ जैसे की बर्फी में दूध| मैं संतों को समाज में उनका सही दर्जा मिलते देखता हूँ – हमारे हाथों में उनका हाथ, हमारे साथ में उनका साथ न की हम शहर में और वह बीहड़ जंगल में|

संतों की वापसी हो गयी है, जैसे शीत लहर के उपरान्त बसंत ऋतू| मैं संतो का स्वागत करता हूँ और विश्व की नई प्रणाली का भी अभिनन्दन करता हूँ जहाँ आकांक्षा और आरोहण को एक ही प्रकार से सिखाया जाए, जहां ज़िम्मेदारी और विकास साथ साथ चलें, जहां विकास और निरंतरता एक दूजे के पर्याय हों, एक दिव्य प्रबंध जहां तकनिकी विकास का निर्माता हो पर जीवन रेखा रहे अध्यात्म| एक शिवयोग जगत, एक संतों की प्रणाली|

मेरा प्रेम और आशीष
नमः शिवाय

विचार करें: यह तस्वीर है गुरूवार, २९ सितंबर की जब मैं एक शिवयोग का लाइव शिविर करवाने जा रहा था जिसका प्रसारण बहुत से देशों में साथ होना था और जब बाबाजी ने अपनी उपस्थ्तिति से सबको आश्चर्यचकित कर दिया, मुझे भी|