“इस शिविर में हम ऐसी ऐसी क्रियाएँ करेंगे जो पहले कभी न की होंगी और यह मैं अपनी उपस्थिति में ही आपसे करवाऊंगा|

इन क्रियाओं को तुम पहली बार करोगे तो तुम्हें बता दूं  कि शरीर को कुछ भी नया दोगे तो शरीर को बताना पड़ेगा की कुछ नया करने जा रहे हो| इसीलिए तो क्रियाओं से पहले भी हम स्वयं का ध्यान करते हैं| जिस प्रकार यदि हम पहली बार कोई गाना सुनते हैं तो हमें उसके बोल, उसकी धुन समझने में समय लगता है, उसी प्रकार हमारा शरीर कोई भी नई वस्तु या क्रिया को गले लगाने से पूर्व परखता है| ऐसे में ध्यान के द्वारा प्रोग्रामिंग करना आवश्यक है|

शरीर हर उस मज़े की तरफ भागेगा जिससे सुख मिले| सुख मिलते ही शरीर खुश| बात वही है कि हम शरीर को सुख की क्या परिभाषा सिखाते हैं| एसी ध्यान साधना और सूक्ष्म क्रियाओं को सुख का दर्जा दोगे तो शरीर उन्हें की सुख का साधन मान लेगा|”